Monday, September 11, 2017

महामृतुन्जय मन्त्र !!

किसी विद्वान से प्राप्त हुआ है ।।
ॐ त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं
जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 देवताआं के घोतक हैं।
उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं।
इन तैंतीस देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है
जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं ।
साथ ही वह नीरोग, ऐश्व‍र्य युक्ता धनवान भी होता है ।
महामृत्युंरजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है । भगवान शिव की अमृतमययी कृपा उस निरन्तंर बरसती रहती है।
• त्रि - ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।
• यम - अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में स्थित है।
• ब - सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।
• कम - जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम कर्ण में स्थित है।
• य - वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।
• जा- अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।
• म - प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
• हे - प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।
• सु -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।
• ग -शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
• न्धिम् -गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है।
• पु- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।
• ष्टि - अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, बाम हस्त के मणिबन्धा में स्थित है।
• व - पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है। बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।
• र्ध - भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है, बाम हस्त अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
• नम् - कपाली रुद्र का घोतक है । उरु मूल में स्थित है।
• उ- दिक्पति रुद्र का घोतक है । यक्ष जानु में स्थित है।
• र्वा - स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है।
• रु - भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है।
• क - धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
• मि - अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है।
• व - मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है।
• ब - वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।
• न्धा - अंशु आदित्यद का घोतक है । वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।
• नात् - भगादित्यअ का बोधक है । वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
• मृ - विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में स्थित है।
• र्त्यो् - दन्दाददित्य् का बोधक है । वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।
• मु - पूषादित्यं का बोधक है । पृष्ठै भगा में स्थित है ।
• क्षी - पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है । नाभि स्थिल में स्थित है।
• य - त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है । गुहय भाग में स्थित है।
• मां - विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।
• मृ - प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग में स्थित है।
• तात् - अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है।
उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्त देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं । जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग - अंग ( जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं ) उनकी रक्षा होती है ।
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Friday, September 8, 2017

वैदिक / पौराणिक परंपरा : श्राद्ध : एक विवेचनात्मक प्रस्तुति श्री शशि शुक्ल (कानपूर) मुंबई !!

श्राद्ध पक्ष की प्रासंगिकता पर पढ़ें विशेष आलेख...मित्रो लेख पूरा पढें दूसरों को पढवाये। मेरा विश्वास है आपका ज्ञानवर्धन होगा।
यह शब्द 'श्रद्धा' से बना है। ब्रह्म पुराण (उपर्युक्त उद्धृत), मरीचि एवं बृहस्पति की परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि श्राद्ध एवं श्रद्धा में घनिष्ठ संबंध है। श्राद्ध में श्राद्धकर्ता का यह अटल विश्वास रहता है कि मृत या पितरों के कल्याण के लिए ब्राह्मणों को जो कुछ भी दिया जाता है, वह उसे या उन्हें किसी प्रकार अवश्य ही मिलता है।
स्कंद पुराण का कथन है कि 'श्राद्ध' नाम इसलिए पड़ा है कि उस कृत्य में श्रद्धा मूल (मूल स्रोत) है। इसका तात्पर्य यह है कि इसमें न केवल विश्वास है, प्रत्युत एक अटल धारणा है कि व्यक्ति को यह करना ही है।
ॠग्वेद में श्रद्धा को 'देवत्व' नाम दिया गया है। मनु व याज्ञवल्क्य ऋषियों ने धर्मशास्त्र में नित्य व नैमित्तिक श्राद्धों की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए कहा कि श्राद्ध करने से कर्ता पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है तथा पितर संतुष्ट रहते हैं जिससे श्राद्धकर्ता व उसके परिवार का कल्याण होता है।
श्राद्ध महिमा में कहा गया है- 'आयु: पूजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्ष सुखानि च। प्रयच्छति तथा राज्यं पितर: श्राद्ध तर्पिता।।' - अर्थात जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनके पितर संतुष्ट होकर उन्हें आयु, संतान, धन, स्वर्ग, राज्य मोक्ष व अन्य सौभाग्य प्रदान करते हैं।
हमारी संस्कृति में माता-पिता व गुरु को विशेष श्रद्धा व आदर दिया जाता है, उन्हें देवतुल्य माना जाता है। 'पितरं प्रीतिमापन्ने प्रियन्ते सर्वदेवता:' - अर्थात पितरों के प्रसन्न होने पर सारे ही देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
आत्मिक प्रगति के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है- 'श्रद्धा।' श्रद्धा में शक्ति भी है। वह पत्थर को देवता बना देती है और मनुष्य को नर से नारायण स्तर तक उठा ले जाती है। किंतु श्रद्धा मात्र चिंतन या कल्पना का नाम नहीं है। उसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी होना चाहिए। यह उदारता, सेवा, सहायता, करुणा आदि के रूप में ही हो सकती है। इन्हें चिंतन तक सीमित न रखकर कार्यरूप में, परमार्थपरक कार्यों में ही परिणत करना होता है। यही सच्चे अर्थों में श्राद्ध है।
संसार के सभी देशों, सभी धर्मों व सभी जातियों में किसी न किसी रूप में मृतकों का श्राद्ध होता है। मृतकों के स्मारक, कवच, मकबरे संसारभर में देखे जाते हैं। पूर्वजों के नाम पर नगर, मुहल्ले, संस्थाएं, मकान, कुएं, तालाब, मंदिर, मीनार आदि बनाकर उनके नाम तथा यश को चिरस्थायी रखने का प्रयत्न किया जाता है। उनकी स्मृति में पर्वों एवं जयंतियों का आयोजन किया जाता है। यह अपने-अपने ढंग के श्राद्ध ही हैं।
'क्या फायदा?' वाला तर्क केवल हिन्दू श्राद्ध पर ही नहीं, समस्त संसार की मानव प्रवृत्ति पर लागू होता है। असल बात यह है कि प्रेम, उपकार, आत्मीयता एवं महानता के लिए मनुष्य स्वभावत: कृतज्ञ होता है और जब तक उस कृतज्ञता के प्रकट करने का प्रत्युपकारस्वरूप कुछ प्रदर्शन न कर ले, तब तक उसे आंतरिक बेचैनी रहती है, इस बेचैनी को वह श्राद्ध द्वारा ही पूरी करता है।
उपकारी के प्रति कृतज्ञता का प्रत्युपकार का भाव रखना भावना क्षेत्र की पवित्रता एवं उत्कृष्टता का प्राणवान चिन्ह है। इसके लिए धनदान आवश्यक नहीं, समय, धन, श्रमदान, भाव दान भी असमर्थता की स्थिति में इसी प्रयोजन की पूर्ति करते हैं। उन्हीं सब बातों पर विचार करते हुए भारतीय धर्म-परंपरा में श्राद्ध-कर्म की महत्ता बताई गई है। सत्पात्र न मिलने या अपनी आर्थिक स्थिति अच्छी न होने की स्थिति में इसे जलांजलि देकर तर्पण के रूप में भी संपन्न किया जा सकता है।
यह सोचना उचित नहीं कि जो मर गए, उन तक हमारी दी हुई वस्तु कैसे पहुंचेगी? पहुंचती तो केवल श्रद्धा है। मरे हुए व्यक्तियों को श्राद्ध-कर्म से कुछ लाभ होता है कि नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि- 'होता है, अवश्य होता है।'
संसार एक समुद्र के समान है जिसमें जल कणों की भांति हर एक जीव है। विश्व एक शिला है तो व्यक्ति उसका एक परमाणु। हर एक आत्मा, जो जीवित या मृत रूप से इस विश्व में मौजूद है, अन्य समस्त आत्माओं से संबद्ध है। संसार में कहीं भी अनीति, युद्ध, कष्ट, अनाचार, अत्याचार हो रहे हैं तो सुदूर देशों के निवासियों के मन में भी उद्वेग उत्पन्न होता है।
जब जाड़े का प्रवाह आता है, तो हर चीज ठंडी होने लगती है और गर्मी की ऋतु में हर चीज की ऊष्णता बढ़ जाती है। छोटा-सा यज्ञ करने से उसकी दिव्य गंध तथा दिव्य भावना समस्त संसार के प्राणियों को लाभ पहुंचाती है। इसी प्रकार कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिए किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शांतिमयी सद्भावना की लहरें पहुंचाता है। ये सूक्ष्म भाव तरंगें सुगंधित पुष्पों की सुगंध की तरह तृप्तिकारक आनंद और उल्लासवर्धक होती हैं।
सद्भावना की सुगंध जीवित और मृतक सभी को तृप्त करती है। इन सभी में अपने स्वर्गीय पितर भी आ जाते हैं। उन्हें भी श्राद्ध यज्ञ की दिव्य तरंगें आत्मशांति प्रदान करती हैं।
जिन्होंने अपने साथ में किसी भी प्रकार की कोई भलाई की है उसे बार-बार प्रकट करना चाहिए, क्योंकि इससे उपकार करने वालों को संतोष तथा प्रोत्साहन प्राप्त होता है। वे अपने ऊपर अधिक प्रेम करते हैं और अधिक घनिष्ठ बनते हैं, साथ-साथ अहसान स्वीकार करने से अपनी नम्रता एवं मधुरता बढ़ती है। उपकारों का बदला चुकाने के लिए किसी न किसी रूप में सदा ही प्रयत्न करते रहना चाहिए।
'पितरों का उद्देश्य करके (उनके कल्याण के लिए) श्रद्धापूर्वक किसी वस्तु का या उससे संबंधित किसी द्रव्य का त्याग श्राद्ध है।'
उचित समय पर शास्त्रसम्मत विधि द्वारा पितरों के लिए श्रद्धाभाव से मंत्रों के साथ जो दान-दक्षिणा आदि दिया जाए, वही श्राद्ध कहलाता है। 20 अंश रेतस (सोम) को 'पितृॠण' कहते हैं। 28 अंश रेतस के रूप में 'श्रद्धा' नामक मार्ग से भेजे जाने वाले 'पिंड' तथा 'जल' आदि के दान को 'श्राद्ध' कहते हैं।
मनुष्य के 3 पूर्वजों यथा- पिता, पितामह एवं प्रपितामह क्रम से पितृदेवों अर्थात वसुओं, रुद्रों एवं आदित्य के समान हैं और श्राद्ध करते समय उनको पूर्वजों का प्रतिनिधि मानना चाहिए।
कुछ लोगों के मत से श्राद्ध से इन बातों का निर्देश होता है- होम, पिंडदान एवं ब्राह्मण तर्पण (ब्राह्मण संतुष्टि भोजन आदि से), किंतु 'श्राद्ध' शब्द का प्रयोग इन तीनों के साथ गौण अर्थ में उपयुक्त समझा जा सकता है।
पितरों के लिए कृष्ण पक्ष उत्तम होता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उनके दिनों का उदय होता है। अमावस्या उनका मध्याह्न है तथा शुक्ल पक्ष की अष्टमी अंतिम दिन होता है। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या को किया गया श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान उन्हें संतुष्टि व ऊर्जा प्रदान करते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पृथ्वीलोक में देवता उत्तर गोल में विचरण करते हैं और दक्षिण गोल भाद्रपद मास की पूर्णिमा को चन्द्रलोक के साथ-साथ पृथ्वी के नजदीक से गुजरता है। इस मास की प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्षभर करते हैं। वे चन्द्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में अपनी मृत्यु तिथि पर अपने घर के दरवाजे पर पहुंच जाते है और वहां अपना सम्मान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नई पीढ़ी को आशीर्वाद देकर चले जाते हैं।
तर्पण क्यों?
जो पितृगण दिवंगत हो चुके हैं उनके लिए तर्पण श्राद्ध का विधान है। श्रद्धांजलि पूजा-उपचार का सरलतम प्रयोग है। अन्य उपचारों में वस्तुओं की जरूरत पड़ती है तथा वे कभी उपलब्ध होती हैं, कभी नहीं। किंतु जल ऐसी वस्तु है जिसे हम दैनिक जीवन में अनिवार्यत: प्रयोग करते हैं।
वह सर्वत्र सुविधापूर्वक मिल भी जाता है इसलिए पुष्पांजलि आदि श्रमसाध्य श्रद्धांजलियों में जलांजलि को सर्वसुलभ माना गया है। उसके प्रयोग में आलस्य और अश्रद्धा के अतिरिक्त और कोई व्यवधान नहीं हो सकता इसलिए सूर्य नारायण को अर्घ्य, तुलसी वृक्ष में जलदान, अतिथियों को अर्घ्य तथा पितरगणों को तर्पण का विधान है।
प्रश्न यह नहीं कि इस पानी की उन्हें आवश्यकता है या नहीं? प्रश्न केवल अपनी अभिव्यक्ति-भर का है। उसे निर्धारित मंत्र बोलते हुए, गायत्री महामंत्र में अथवा बिना मंत्र के भी जलांजलि दी जा सकती है। यही है उनके प्रति पूजा-अर्चा का सुगमतम विधान। शास्त्रीय भाषा में इसे 'तर्पण' कहा जाता है। इसमें यह तर्क करने की गुंजाइश नहीं है कि यह पानी उन पूर्वजों या सूर्य तक पहुंचा या नहीं?
1. इसके पीछे अपनी कृतज्ञताभरी भावनाओं को सींचते रहने की अभिव्यक्ति की ही प्रमुखता है।
2. पितृऋण को चुकाने के लिए दूसरा कृत्य आता है- 'श्राद्ध'। श्राद्ध का प्रचलित रूप तो 'ब्राह्मण भोजन' मात्र रह गया है, पर बात ऐसी है नहीं। अपने साधनों का एक अंश पितृ प्रयोजनों के निमित्त ऐसे कार्यों में लगाया जाना चाहिए जिससे लोक-कल्याण का प्रयोजन भी सधता हो।
ऐसे श्राद्ध कृत्यों में समय की आवश्यकता को देखते हुए वृक्षारोपण ऐसा कार्य हो सकता है जिसे ब्रह्मभोज से भी कहीं अधिक महत्व का माना जा सके। किसी व्यक्ति को भोजन करा देने से उसकी एक समय की भूख बुझती है।
दूसरा समय आते ही फिर वह आवश्यकता जाग पड़ती है। उसे कोई दूसरा व्यक्ति कहां तक कब तक पूरा करता रहे। फिर यदि कोई व्यक्ति अपंग, मुसीबतग्रस्त या लोकसेवी नहीं है तो उसे मुफ्त में भोजन कराते रहने के पीछे किसी उच्च उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती।
3. वृक्ष वायुशोधन करते हैं। छाया देते हैं। फल-फूल भी मिलते हैं। हरे पत्ते पशुओं का भोजन बन सकते हैं। सूखे पत्तों से जमीन को खाद मिलती है। लकड़ी के अनेक उपयोग हैं। वृक्षों से बादल बरसते हैं। भूमि का कटाव रुकता है। पक्षी घोंसले बनाते हैं। उनकी छाया में मनुष्यों व पशुओं को विश्राम मिलता है। इस प्रकार वृक्षारोपण भी एक उपयोगी प्राणी के पोषण के समान है।
श्राद्ध रूप में ऐसे वृक्ष लगाए जाएं, जो किसी न किसी रूप में प्राणियों की आवश्यकता पूरी करते हों। अपने पास कृषियोग्य भूमि से थोड़ी भी जमीन बचती हो, कम उपयोगी हो तो उसमें आम, पीपल, महुआ आदि के वृक्ष लगा देने चाहिए। केवल सींचने, रखवाली करने आदि की जिम्मेदारी अपने कंधे पर लेकर दूसरों की जमीन में वृक्ष लगा देने में भी पुण्य फल की प्राप्ति हो सकती है।
4. वृक्षों की भांति ही जलाशयों के निर्माण का भी उपयोग है। तालाबों में हर साल वर्षा के पानी के साथ मिट्टी भर जाती है और उनकी सतह ऊंची हो जाने से कम पानी समाता है, जो जल्दी ही सूख जाता है। इन्हें यदि हर साल श्रमदान से गहरे करते रहा जाए तो पशुओं को पानी, सिंघाड़ा, कमल जैसी बेलें तथा तल में जमने वाली चिकनी मिट्टी से मकानों की मरम्मत हो सकती है।
श्राद्ध पक्ष की वर्तमान में प्रासंगिकता?
हम लोग हमेशा बदलाव चाहते हैं। हमारी सोच दशा व समय के साथ बदल जाती है, लेकिन कुछ वस्तुएं हमेशा प्रासंगिक होती हैं। पितृपक्ष हमारे परिवार से जुड़ी एक परंपरा है व अपनों को याद करने का एक अवसर है। जो हमसे जुड़े हैं या जुड़े थे, वो हम सबके लिए हमेशा प्रासंगिक होते हैं। श्राद्ध पक्ष के वर्तमान में प्रासंगिक होने के कई कारण हैं-
1. हमारा समाज अत्यंत भौतिकवादी होता जा रहा है। बगैर स्वार्थ के कोई किसी की सहायता नहीं करना चाहता है। पितृपक्ष में अपने पूर्वजों के लिए जो भी दान या भोजन हम दूसरों को देते हैं, उससे समाज के गरीब एवं जरूरतमंदों की सहायता होती है तथा समाज में सहयोग एवं समन्वय की भावना जाग्रत होती है।
2. जो कभी हमारे परिवार का हिस्सा रहे हैं जिनका खून हमारी रगों में दौड़ रहा है, कम से कम एक पखवाड़ा हम उन्हें याद करते हैं। इस बहाने हम अपने पूर्वजों को याद करके अपने परिवार, समाज एवं धर्म में अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।
3. हमारे पूर्वज एवं बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं। वर्तमान में बुजुर्ग समाज की मुख्य धारा से कटते जा रहे हैं। इस एक पखवाड़े में हम सभी उनके प्रति सम्मान एवं सद्भाव व्यक्त करते हैं।
4. परंपराओं से समाज एवं परिवार में एकनिष्ठा पनपती है। पितृपक्ष को मनाने से हमारी नई पीढ़ी में सांस्कृतिक सोच के साथ बुजुर्गों के सम्मान की भावना का जागरण होता है। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। श्रद्धा को प्रकट करने का जो प्रदर्शन होता है, वह 'श्राद्ध' कहा जाता है।
जीवित पितरों व गुरुजनों के लिए श्रद्धा प्रकट करने व श्रद्धा करने के लिए उनकी अनेक प्रकार से सेवा, पूजा तथा संतुष्टि की जा सकती है, परंतु स्वर्गीय पितरों के लिए श्रद्धा प्रकट करने व अपनी कृतज्ञता को प्रकट करने का कोई निमित्त निर्माण करना पड़ता है। यह निमित्त श्राद्ध है। स्वर्गीय गुरुजनों के कार्यों, उपकारों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने से ही छुटकारा नहीं मिल जाता।
हम अपने अवतारों, देवताओं, ऋषियों, महापुरुषों और पूजनीय पूर्वजों की जयंतियां धूमधाम से मनाते हैं, उनके गुणों का वर्णन करते हैं, उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके चरित्रों एवं विचारों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं।
यदि कहा जाए कि मृत व्यक्तियों ने तो दूसरी जगह जन्म ले लिया होगा तो उनकी जयंतियां मनाने से क्या लाभ? तो यह तर्क बहुत अविवेकपूर्ण होगा। श्राद्ध और तर्पण का मूल आधार अपनी कृतज्ञता और आत्मीयता व सात्विक वृत्तियों को जागृत रखना है। इन प्रवृत्तियों का जीवित, जागृत रहना संसार की सुख-शांति के लिए नितांत आवश्यक है।
इसलिए मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप उपरोक्त कारणों में से कम से कम एक के लिए पितृ पक्ष को जरूर मानें। इससे आप और आपके परिवार को और अधिक शांति और खुशी पाने में लिए मदद मिलेगी।
अब सवाल यह है कि आप इन दिनों के महत्व को जानते हैं तो यह सुनिश्चित करें कि आप इस वर्ष पितृपक्ष में पितरों की पूजा करेंगे और अपने पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। यह आशीर्वाद निश्चित रूप से आपके जीवन को प्रभावशाली एवं सुखमय बना देगा।
श्राद्ध पक्ष की प्रासंगिकता पर पढ़ें विशेष आलेख...मित्रो लेख पूरा पढें दूसरों को पढवाये। मेरा विश्वास है आपका ज्ञानवर्धन होगा।
यह शब्द 'श्रद्धा' से बना है। ब्रह्म पुराण (उपर्युक्त उद्धृत), मरीचि एवं बृहस्पति की परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि श्राद्ध एवं श्रद्धा में घनिष्ठ संबंध है। श्राद्ध में श्राद्धकर्ता का यह अटल विश्वास रहता है कि मृत या पितरों के कल्याण के लिए ब्राह्मणों को जो कुछ भी दिया जाता है, वह उसे या उन्हें किसी प्रकार अवश्य ही मिलता है।
स्कंद पुराण का कथन है कि 'श्राद्ध' नाम इसलिए पड़ा है कि उस कृत्य में श्रद्धा मूल (मूल स्रोत) है। इसका तात्पर्य यह है कि इसमें न केवल विश्वास है, प्रत्युत एक अटल धारणा है कि व्यक्ति को यह करना ही है।
ॠग्वेद में श्रद्धा को 'देवत्व' नाम दिया गया है। मनु व याज्ञवल्क्य ऋषियों ने धर्मशास्त्र में नित्य व नैमित्तिक श्राद्धों की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए कहा कि श्राद्ध करने से कर्ता पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है तथा पितर संतुष्ट रहते हैं जिससे श्राद्धकर्ता व उसके परिवार का कल्याण होता है।
श्राद्ध महिमा में कहा गया है- 'आयु: पूजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्ष सुखानि च। प्रयच्छति तथा राज्यं पितर: श्राद्ध तर्पिता।।' - अर्थात जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनके पितर संतुष्ट होकर उन्हें आयु, संतान, धन, स्वर्ग, राज्य मोक्ष व अन्य सौभाग्य प्रदान करते हैं।
हमारी संस्कृति में माता-पिता व गुरु को विशेष श्रद्धा व आदर दिया जाता है, उन्हें देवतुल्य माना जाता है। 'पितरं प्रीतिमापन्ने प्रियन्ते सर्वदेवता:' - अर्थात पितरों के प्रसन्न होने पर सारे ही देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
आत्मिक प्रगति के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है- 'श्रद्धा।' श्रद्धा में शक्ति भी है। वह पत्थर को देवता बना देती है और मनुष्य को नर से नारायण स्तर तक उठा ले जाती है। किंतु श्रद्धा मात्र चिंतन या कल्पना का नाम नहीं है। उसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी होना चाहिए। यह उदारता, सेवा, सहायता, करुणा आदि के रूप में ही हो सकती है। इन्हें चिंतन तक सीमित न रखकर कार्यरूप में, परमार्थपरक कार्यों में ही परिणत करना होता है। यही सच्चे अर्थों में श्राद्ध है।
संसार के सभी देशों, सभी धर्मों व सभी जातियों में किसी न किसी रूप में मृतकों का श्राद्ध होता है। मृतकों के स्मारक, कवच, मकबरे संसारभर में देखे जाते हैं। पूर्वजों के नाम पर नगर, मुहल्ले, संस्थाएं, मकान, कुएं, तालाब, मंदिर, मीनार आदि बनाकर उनके नाम तथा यश को चिरस्थायी रखने का प्रयत्न किया जाता है। उनकी स्मृति में पर्वों एवं जयंतियों का आयोजन किया जाता है। यह अपने-अपने ढंग के श्राद्ध ही हैं।
'क्या फायदा?' वाला तर्क केवल हिन्दू श्राद्ध पर ही नहीं, समस्त संसार की मानव प्रवृत्ति पर लागू होता है। असल बात यह है कि प्रेम, उपकार, आत्मीयता एवं महानता के लिए मनुष्य स्वभावत: कृतज्ञ होता है और जब तक उस कृतज्ञता के प्रकट करने का प्रत्युपकारस्वरूप कुछ प्रदर्शन न कर ले, तब तक उसे आंतरिक बेचैनी रहती है, इस बेचैनी को वह श्राद्ध द्वारा ही पूरी करता है।
उपकारी के प्रति कृतज्ञता का प्रत्युपकार का भाव रखना भावना क्षेत्र की पवित्रता एवं उत्कृष्टता का प्राणवान चिन्ह है। इसके लिए धनदान आवश्यक नहीं, समय, धन, श्रमदान, भाव दान भी असमर्थता की स्थिति में इसी प्रयोजन की पूर्ति करते हैं। उन्हीं सब बातों पर विचार करते हुए भारतीय धर्म-परंपरा में श्राद्ध-कर्म की महत्ता बताई गई है। सत्पात्र न मिलने या अपनी आर्थिक स्थिति अच्छी न होने की स्थिति में इसे जलांजलि देकर तर्पण के रूप में भी संपन्न किया जा सकता है।
यह सोचना उचित नहीं कि जो मर गए, उन तक हमारी दी हुई वस्तु कैसे पहुंचेगी? पहुंचती तो केवल श्रद्धा है। मरे हुए व्यक्तियों को श्राद्ध-कर्म से कुछ लाभ होता है कि नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि- 'होता है, अवश्य होता है।'
संसार एक समुद्र के समान है जिसमें जल कणों की भांति हर एक जीव है। विश्व एक शिला है तो व्यक्ति उसका एक परमाणु। हर एक आत्मा, जो जीवित या मृत रूप से इस विश्व में मौजूद है, अन्य समस्त आत्माओं से संबद्ध है। संसार में कहीं भी अनीति, युद्ध, कष्ट, अनाचार, अत्याचार हो रहे हैं तो सुदूर देशों के निवासियों के मन में भी उद्वेग उत्पन्न होता है।
जब जाड़े का प्रवाह आता है, तो हर चीज ठंडी होने लगती है और गर्मी की ऋतु में हर चीज की ऊष्णता बढ़ जाती है। छोटा-सा यज्ञ करने से उसकी दिव्य गंध तथा दिव्य भावना समस्त संसार के प्राणियों को लाभ पहुंचाती है। इसी प्रकार कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिए किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शांतिमयी सद्भावना की लहरें पहुंचाता है। ये सूक्ष्म भाव तरंगें सुगंधित पुष्पों की सुगंध की तरह तृप्तिकारक आनंद और उल्लासवर्धक होती हैं।
सद्भावना की सुगंध जीवित और मृतक सभी को तृप्त करती है। इन सभी में अपने स्वर्गीय पितर भी आ जाते हैं। उन्हें भी श्राद्ध यज्ञ की दिव्य तरंगें आत्मशांति प्रदान करती हैं।
जिन्होंने अपने साथ में किसी भी प्रकार की कोई भलाई की है उसे बार-बार प्रकट करना चाहिए, क्योंकि इससे उपकार करने वालों को संतोष तथा प्रोत्साहन प्राप्त होता है। वे अपने ऊपर अधिक प्रेम करते हैं और अधिक घनिष्ठ बनते हैं, साथ-साथ अहसान स्वीकार करने से अपनी नम्रता एवं मधुरता बढ़ती है। उपकारों का बदला चुकाने के लिए किसी न किसी रूप में सदा ही प्रयत्न करते रहना चाहिए।
'पितरों का उद्देश्य करके (उनके कल्याण के लिए) श्रद्धापूर्वक किसी वस्तु का या उससे संबंधित किसी द्रव्य का त्याग श्राद्ध है।'
उचित समय पर शास्त्रसम्मत विधि द्वारा पितरों के लिए श्रद्धाभाव से मंत्रों के साथ जो दान-दक्षिणा आदि दिया जाए, वही श्राद्ध कहलाता है। 20 अंश रेतस (सोम) को 'पितृॠण' कहते हैं। 28 अंश रेतस के रूप में 'श्रद्धा' नामक मार्ग से भेजे जाने वाले 'पिंड' तथा 'जल' आदि के दान को 'श्राद्ध' कहते हैं।
मनुष्य के 3 पूर्वजों यथा- पिता, पितामह एवं प्रपितामह क्रम से पितृदेवों अर्थात वसुओं, रुद्रों एवं आदित्य के समान हैं और श्राद्ध करते समय उनको पूर्वजों का प्रतिनिधि मानना चाहिए।
कुछ लोगों के मत से श्राद्ध से इन बातों का निर्देश होता है- होम, पिंडदान एवं ब्राह्मण तर्पण (ब्राह्मण संतुष्टि भोजन आदि से), किंतु 'श्राद्ध' शब्द का प्रयोग इन तीनों के साथ गौण अर्थ में उपयुक्त समझा जा सकता है।
पितरों के लिए कृष्ण पक्ष उत्तम होता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उनके दिनों का उदय होता है। अमावस्या उनका मध्याह्न है तथा शुक्ल पक्ष की अष्टमी अंतिम दिन होता है। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या को किया गया श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान उन्हें संतुष्टि व ऊर्जा प्रदान करते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पृथ्वीलोक में देवता उत्तर गोल में विचरण करते हैं और दक्षिण गोल भाद्रपद मास की पूर्णिमा को चन्द्रलोक के साथ-साथ पृथ्वी के नजदीक से गुजरता है। इस मास की प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्षभर करते हैं। वे चन्द्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में अपनी मृत्यु तिथि पर अपने घर के दरवाजे पर पहुंच जाते है और वहां अपना सम्मान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नई पीढ़ी को आशीर्वाद देकर चले जाते हैं।
तर्पण क्यों?
जो पितृगण दिवंगत हो चुके हैं उनके लिए तर्पण श्राद्ध का विधान है। श्रद्धांजलि पूजा-उपचार का सरलतम प्रयोग है। अन्य उपचारों में वस्तुओं की जरूरत पड़ती है तथा वे कभी उपलब्ध होती हैं, कभी नहीं। किंतु जल ऐसी वस्तु है जिसे हम दैनिक जीवन में अनिवार्यत: प्रयोग करते हैं।
वह सर्वत्र सुविधापूर्वक मिल भी जाता है इसलिए पुष्पांजलि आदि श्रमसाध्य श्रद्धांजलियों में जलांजलि को सर्वसुलभ माना गया है। उसके प्रयोग में आलस्य और अश्रद्धा के अतिरिक्त और कोई व्यवधान नहीं हो सकता इसलिए सूर्य नारायण को अर्घ्य, तुलसी वृक्ष में जलदान, अतिथियों को अर्घ्य तथा पितरगणों को तर्पण का विधान है।
प्रश्न यह नहीं कि इस पानी की उन्हें आवश्यकता है या नहीं? प्रश्न केवल अपनी अभिव्यक्ति-भर का है। उसे निर्धारित मंत्र बोलते हुए, गायत्री महामंत्र में अथवा बिना मंत्र के भी जलांजलि दी जा सकती है। यही है उनके प्रति पूजा-अर्चा का सुगमतम विधान। शास्त्रीय भाषा में इसे 'तर्पण' कहा जाता है। इसमें यह तर्क करने की गुंजाइश नहीं है कि यह पानी उन पूर्वजों या सूर्य तक पहुंचा या नहीं?
1. इसके पीछे अपनी कृतज्ञताभरी भावनाओं को सींचते रहने की अभिव्यक्ति की ही प्रमुखता है।
2. पितृऋण को चुकाने के लिए दूसरा कृत्य आता है- 'श्राद्ध'। श्राद्ध का प्रचलित रूप तो 'ब्राह्मण भोजन' मात्र रह गया है, पर बात ऐसी है नहीं। अपने साधनों का एक अंश पितृ प्रयोजनों के निमित्त ऐसे कार्यों में लगाया जाना चाहिए जिससे लोक-कल्याण का प्रयोजन भी सधता हो।
ऐसे श्राद्ध कृत्यों में समय की आवश्यकता को देखते हुए वृक्षारोपण ऐसा कार्य हो सकता है जिसे ब्रह्मभोज से भी कहीं अधिक महत्व का माना जा सके। किसी व्यक्ति को भोजन करा देने से उसकी एक समय की भूख बुझती है।
दूसरा समय आते ही फिर वह आवश्यकता जाग पड़ती है। उसे कोई दूसरा व्यक्ति कहां तक कब तक पूरा करता रहे। फिर यदि कोई व्यक्ति अपंग, मुसीबतग्रस्त या लोकसेवी नहीं है तो उसे मुफ्त में भोजन कराते रहने के पीछे किसी उच्च उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती।
3. वृक्ष वायुशोधन करते हैं। छाया देते हैं। फल-फूल भी मिलते हैं। हरे पत्ते पशुओं का भोजन बन सकते हैं। सूखे पत्तों से जमीन को खाद मिलती है। लकड़ी के अनेक उपयोग हैं। वृक्षों से बादल बरसते हैं। भूमि का कटाव रुकता है। पक्षी घोंसले बनाते हैं। उनकी छाया में मनुष्यों व पशुओं को विश्राम मिलता है। इस प्रकार वृक्षारोपण भी एक उपयोगी प्राणी के पोषण के समान है।
श्राद्ध रूप में ऐसे वृक्ष लगाए जाएं, जो किसी न किसी रूप में प्राणियों की आवश्यकता पूरी करते हों। अपने पास कृषियोग्य भूमि से थोड़ी भी जमीन बचती हो, कम उपयोगी हो तो उसमें आम, पीपल, महुआ आदि के वृक्ष लगा देने चाहिए। केवल सींचने, रखवाली करने आदि की जिम्मेदारी अपने कंधे पर लेकर दूसरों की जमीन में वृक्ष लगा देने में भी पुण्य फल की प्राप्ति हो सकती है।
4. वृक्षों की भांति ही जलाशयों के निर्माण का भी उपयोग है। तालाबों में हर साल वर्षा के पानी के साथ मिट्टी भर जाती है और उनकी सतह ऊंची हो जाने से कम पानी समाता है, जो जल्दी ही सूख जाता है। इन्हें यदि हर साल श्रमदान से गहरे करते रहा जाए तो पशुओं को पानी, सिंघाड़ा, कमल जैसी बेलें तथा तल में जमने वाली चिकनी मिट्टी से मकानों की मरम्मत हो सकती है।
श्राद्ध पक्ष की वर्तमान में प्रासंगिकता?
हम लोग हमेशा बदलाव चाहते हैं। हमारी सोच दशा व समय के साथ बदल जाती है, लेकिन कुछ वस्तुएं हमेशा प्रासंगिक होती हैं। पितृपक्ष हमारे परिवार से जुड़ी एक परंपरा है व अपनों को याद करने का एक अवसर है। जो हमसे जुड़े हैं या जुड़े थे, वो हम सबके लिए हमेशा प्रासंगिक होते हैं। श्राद्ध पक्ष के वर्तमान में प्रासंगिक होने के कई कारण हैं-
1. हमारा समाज अत्यंत भौतिकवादी होता जा रहा है। बगैर स्वार्थ के कोई किसी की सहायता नहीं करना चाहता है। पितृपक्ष में अपने पूर्वजों के लिए जो भी दान या भोजन हम दूसरों को देते हैं, उससे समाज के गरीब एवं जरूरतमंदों की सहायता होती है तथा समाज में सहयोग एवं समन्वय की भावना जाग्रत होती है।
2. जो कभी हमारे परिवार का हिस्सा रहे हैं जिनका खून हमारी रगों में दौड़ रहा है, कम से कम एक पखवाड़ा हम उन्हें याद करते हैं। इस बहाने हम अपने पूर्वजों को याद करके अपने परिवार, समाज एवं धर्म में अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।
3. हमारे पूर्वज एवं बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं। वर्तमान में बुजुर्ग समाज की मुख्य धारा से कटते जा रहे हैं। इस एक पखवाड़े में हम सभी उनके प्रति सम्मान एवं सद्भाव व्यक्त करते हैं।
4. परंपराओं से समाज एवं परिवार में एकनिष्ठा पनपती है। पितृपक्ष को मनाने से हमारी नई पीढ़ी में सांस्कृतिक सोच के साथ बुजुर्गों के सम्मान की भावना का जागरण होता है। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। श्रद्धा को प्रकट करने का जो प्रदर्शन होता है, वह 'श्राद्ध' कहा जाता है।
जीवित पितरों व गुरुजनों के लिए श्रद्धा प्रकट करने व श्रद्धा करने के लिए उनकी अनेक प्रकार से सेवा, पूजा तथा संतुष्टि की जा सकती है, परंतु स्वर्गीय पितरों के लिए श्रद्धा प्रकट करने व अपनी कृतज्ञता को प्रकट करने का कोई निमित्त निर्माण करना पड़ता है। यह निमित्त श्राद्ध है। स्वर्गीय गुरुजनों के कार्यों, उपकारों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने से ही छुटकारा नहीं मिल जाता।
हम अपने अवतारों, देवताओं, ऋषियों, महापुरुषों और पूजनीय पूर्वजों की जयंतियां धूमधाम से मनाते हैं, उनके गुणों का वर्णन करते हैं, उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके चरित्रों एवं विचारों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं।
यदि कहा जाए कि मृत व्यक्तियों ने तो दूसरी जगह जन्म ले लिया होगा तो उनकी जयंतियां मनाने से क्या लाभ? तो यह तर्क बहुत अविवेकपूर्ण होगा। श्राद्ध और तर्पण का मूल आधार अपनी कृतज्ञता और आत्मीयता व सात्विक वृत्तियों को जागृत रखना है। इन प्रवृत्तियों का जीवित, जागृत रहना संसार की सुख-शांति के लिए नितांत आवश्यक है।
इसलिए मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप उपरोक्त कारणों में से कम से कम एक के लिए पितृ पक्ष को जरूर मानें। इससे आप और आपके परिवार को और अधिक शांति और खुशी पाने में लिए मदद मिलेगी।
अब सवाल यह है कि आप इन दिनों के महत्व को जानते हैं तो यह सुनिश्चित करें कि आप इस वर्ष पितृपक्ष में पितरों की पूजा करेंगे और अपने पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। यह आशीर्वाद निश्चित रूप से आपके जीवन को प्रभावशाली एवं सुखमय बना देगा।

पितृ पक्ष का महत्व : सार्थक लेख : प्रस्तुतकर्ता श्री शशि शुक्ल (कानपूर) मुम्बई

क्यों जरूरी है श्राद्ध, क्या है पितृ पक्ष का महत्व और क्या है सही तरीका...
भारतीय महीनों की गणना के अनुसार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को सृष्टि पालक भगवान विष्णु के प्रतिरूप श्रीकृष्ण का जन्म धूमधान से मनाया गया है। तदुपरांत शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को प्रथम देव गणेशजी का जन्मदिन यानी गणेश महोत्सव के बाद भाद्र पक्ष माह की पूर्णिमा से अपने पितरों की मोक्ष प्राप्ति के लिए अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का महापर्व शुरू हो जाता है।
इसको महापर्व इसलिए बोला जाता है क्योंकि नौदुर्गा महोत्सव नौ दिन का होता है, दशहरा पर्व दस दिन का होता है, पर यह पितृ पक्ष सोलह दिनों तक चलता है।
हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार अश्विन माह के कृष्ण पक्ष से अमावस्या तक अपने पितरों के श्राद्ध की परंपरा है। यानी कि 12 महीनों के मध्य में छठे माह भाद्र पक्ष की पूर्णिमा से (यानी आखिरी दिन से) 7वें माह अश्विन के दिनों में यह पितृ पक्ष का महापर्व मनाया जाता है।
सूर्य भी अपनी प्रथम राशि मेष से भ्रमण करता हुआ जब छठी राशि कन्या में एक माह के लिए भ्रमण करता है तब ही यह सोलह दिन का पितृ पक्ष मनाया जाता है।
उपरोक्त ज्योतिषीय पारंपरिक गणना का महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि शास्त्रों में भी कहा गया है कि आपको सीधे खड़े होने के लिए रीढ़ की हड्डी यानी बैकबोन का मजूबत होना बहुत आवश्यक है, जो शरीर के लगभग मध्य भाग में स्थित है और जिसके चलते ही हमारे शरीर को एक पहचान मिलती है।
उसी तरह हम सभी जन उन पूर्वजों के अंश हैं अर्थात हमारी जो पहचान है यानी हमारी रीढ़ की हड्डी मजबूत बनी रहे उसके लिए हर वर्ष के मध्य में अपने पूर्वजों को अवश्य याद करें और हमें सामाजिक और पारिवारिक पहचान देने के लिए श्राद्ध कर्म के रूप में अपना धन्यवाद अर्थात अपनी श्रद्धाजंलि दें।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में हमारे पूर्वज मोक्ष प्राप्ति की कामना लिए अपने परिजनों के निकट अनेक रूपों में आते हैं। इस पर्व में अपने पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व उनकी आत्मा की शांति देने के लिए श्राद्ध किया जाता है और उनसे जीवन में खुशहाली के लिए आशीर्वाद की कामना की जाती है।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार जिस तिथि में माता-पिता, दादा-दादी आदि परिजनों का निधन होता है। इन 16 दिनों में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध करना उत्तम रहता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उसी तिथि में जब उनके पुत्र या पौत्र द्वारा श्राद्ध किया जाता है तो पितृ लोक में भ्रमण करने से मुक्ति मिलकर पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त हो जाता है। हमारे पितरों की आत्मा की शांति के लिए ‘श्रीमद भागवत् गीता’ या ‘भागवत पुराण’ का पाठ अति उत्तम माना जाता है।
ज्योतिष में नवग्रहों में सूर्य को पिता व चंद्रमा को मां का कारक माना गया है। जिस तरह सूर्य ग्रहण व चंद्र ग्रहण लगने पर कोई भी शुभ कार्य का शुभारंभ मना होता है, वैसे ही पितृ पक्ष में भी माता-पिता, दादा-दादी के श्राद्ध के पक्ष के कारण शुभ कार्य शुरू करने की मनाही रहती है, जैसे-विवाह, मकान या वाहन की खरीदारी इत्यादि।
कैसे करें श्राद्ध पितृ पक्ष में तर्पण और श्राद्ध सामान्यत: दोपहर 12 बजे के लगभग करना ठीक माना जाता है। इसे किसी सरोवर, नदी या फिर अपने घर पर भी किया जा सकता है।
परंपरा अनुसार, अपने पितरों के आवाहन के लिए भात, काले तिल व घिक का मिश्रण करके पिंड दान व तर्पण किया जाता है। इसके पश्चात विष्णु भगवान व यमराज की पूजा-अर्चना के साथ-साथ अपने पितरों की पूजा भी की जाती है।
अपनी तीन पीढ़ी पूर्व तक के पूर्वजों की पूजा करने की मान्यता है। ब्राह्मण को घर पर आमंत्रित कर सम्मानपूर्वक उनके द्वारा पूजा करवाने के उपरांत अपने पूर्वजों के लिए बनाया गया विशेष भोजन समर्पित किया जाता है।
फिर आमंत्रित ब्राह्मण को भोजन करवाया जाता है। ब्राह्मण को दक्षिणा, फल, मिठाई और वस्त्र देकर प्रसन्न किया जाता है व चरण स्पर्श कर सभी परिवारजन उनसे आशीष लेते हैं।
पित पृक्ष में पिंड दान अवश्य करना चाहिए ताकि देवों व पितरों का आशीर्वाद मिल सके।
अपने पितरों के पसंदीदा भोजन बनाना अच्छा माना जाता है। सामान्यत: पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों के लिए कद्दू की सब्जी, दाल-भात, पूरी व खीर बनाना शुभ माना जाता है। पूजा के बाद पूरी व खीर सहित अन्य सब्जियां एक थाली में सजाकर गाय, कुत्ता, कौवा और चींटियों को देना अति आवश्यक माना जाता है।
कहा जाता है कि कौवे व अन्य पक्षियों द्वारा भोजन ग्रहण करने पर ही पितरों को सही मायने में भोजन प्राप्त होता है, क्योंकि पक्षियों को पितरों का दूत व विशेष रूप से कौवे को उनका प्रतिनिधि माना जाता है। पितृ पक्ष में अपशब्द बोलना, ईर्ष्या करना, क्रोध करना बुरा माना जाता है व इनका त्याग करना ही चाहिए।
इस दौरान घर पर लहसुन, प्याज, नॉन-वेज और किसी भी तरह के नशे का सेवन वर्जित माना जाता है। पीपल के पेड़ के नीचे शु्द्ध घी का दिया जलाकर गंगा जल, दूध, घी, अक्षत व पुष्प चढ़ाने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।
घर में गीता का पाठ करना भी इस अवधि में काफी अच्छा माना गया है। यह सब करके आप अपने पितरों का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यदि इस अवसर पर अपने पूर्वजों के सम्मान में उनके नाम से प्याऊ, स्कूल, धर्मशाला आदि के निर्माण में सहयोग करें तो माना जाता है कि आपके पूर्वज आप पर अति कृपा बनाए रखते हैं।
यह महत्वपूर्ण है कि पितरों को धन से नहीं, बल्कि भावना से प्रसन्न करना चाहिए। विष्णु पुराण में भी कहा गया है कि निर्धन व्यक्ति जो नाना प्रकार के पकवान बनाकर अपने पितरों को विशेष भोजन अर्पित करने में सक्षम नहीं हैं, वे यदि मोटा अनाज या चावल या आटा और यदि संभव हो तो कोई सब्जी-साग व फल भी यदि पितरों को प्रति पूर्ण आस्था से किसी ब्राह्मण को दान करता है तो भी उसे अपने पूर्वजों का पूरा आशीर्वाद मिल जाता है।
यदि मोटा अनाज व फल देना भी मुश्किल हो तो वो सिर्फ अपने पितरों को तिल मिश्रित जल को तीन उंगुलियों में लेकर तर्पण कर सकता है, ऐसा करने से भी उसकी पूरी प्रक्रिया होना माना जाता है।
श्राद्ध व तर्पण के दौरान ब्राह्मण को तीन बार जल में तिल मिलाकर दान देने व बाद में गाय को घास खिलाकर सूर्य देवता से प्रार्थना करते हुए कहना चाहिए कि मैंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार जो किया उससे प्रसन्न होकर मेरे पितरों को मोक्ष दें, तो इससे आपके पितरों को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है व व्यक्ति का पूर्ण श्राद्ध का फल प्राप्त हो जाता है।
यदि माता-पिता, दादा-दादी इत्यादि किसी के निधन की सही तिथि का ज्ञान नहीं हो तो इस पर्व के अंतिम दिन यानी अमावस्या पर उनका श्राद्ध करने से पूर्ण फल मिल जाता है।

Nadi Astrology : Some important facts penned by Shri Sanjeev Ranjan Mishra Patna India.

NADI ASTROLOGY
Nadi Astrology is a collective name given for compendium texts written in South India. In the Northern sides, they’re known as Samhitas. The North has Bhrigu Samhita, the South has Bhrigu Nadi. There are numerous texts developed by several sages with their own predictive methodologies which have been explained through numerous horoscopes and pattern-- Some important Nadi's are Bhirgu Nadi, Bhirgu Nandi Nadi, Navagrah Nadi ( Surya, Chandra , Budh Nadi etc.) ,Ravan Samhita ( Guruwalia UP) , Narad samhita ( Champaran Bihar), Arun Samhita ( banaras) etc. There are NUMEROUS Nadi Centers who use old Nadi texts that had horoscope compilations to match yours and then read results written for them. NARAD sAMHITA is unique as it explains alltogether a different system of astrology -BHUGANGA JYOTISH -IN THIS SIMPLY BY MEASURING the span from manibandh rekha to to top of ring fingure and from the first letter uttered by the person whole horoscope is cast and prediction are given
The Nadi texts are humongous volumes and contain authentic information that has stood the test of time. Below, I share pictures of a privately published copy of Bhrigu Samhita that I have. I have added watermarks to the image so that other geniuses do not download the image and use it for their marketing.
Just a quick note. I have learnt from these texts but I do not give Nadi Readings from these. The copy I have has majority of horoscope till the 1900 AD. If there are some from the past few decades I am not the least bit interested in wasting my time and energy searching for those. Kindly do not put forth any such requests. There are dedicated temples and places which offer such services. And trust me, it is a nightmare to find a horoscope from here.
The circles that you see in one of the images are the various combinations of horoscopes each with serial numbers. So I would first have to find out which one of these belongs to a person. There are pages after pages of these arranged by year, month, type of horoscope (affluent, deprived, etc.)
Once I get the horoscope, I go to the reading written for it. The entire text of Bhrigu Samhita is a conversation between Maharishi Bhrigu and his son Shukracharya. The image to the left of the circles is the typical reading. The one above is the heading of various chapters and how a chapter starts.
Now, having said that; the Bhrigu Samhita has no “divine knowledge”. No Nadi text written anywhere in the world has even the slightest hint of anything out of ordinary. The horoscope is interpreted based on rules of astrology and the results are laid down. Most of these results do not even match now, because the context of life has changed. Early marriage once meant marriage in 11th or 12th year and late meant at 19. Today, 19 is pretty early for marriage and late can many anything from 30 to 60! Hence, contexts change and the readings become invalid without the proper context. However, knowledge remains.
Now, the question primarily asks about methodology, so I am going to address that in much more detail. I am assuming the people asking and reading want to know the concept behind Nadi and hence I am assuming they have basic idea of Vedic astrology.
So, Nadi, although I hate the the word as it has been used by many fakes; is nothing but the compilation of a particular school of thought. Just like the modern vedic astrology is said to be either a Parashari school of thought, or Jaimini school of thought, or KP school of thought; same way, the most ancient schools of thoughts were known by their preachers. Since knowledge was not as widespread and written communication was yet developing, sages wrote their wisdom on palm leaves, tree barks and any such thing. The compendium of a sage was known as his samhita/nadi. The work on astrology by Shukracharya came to be known as Shukra Nadi, by Agasthya came to be known as Agathiyar Nadi or Agasthya Samhita, by Bhrigu was Bhrigu Samhita, by Nandi was Nandi Nadi, by Narada was Narada Samhita, the mutual contributions of the seven great sages came to be known as Saptarishi Nadi and so on are the various Nadis and Samhitas. Each deals with astrology in a particular way and each does an exceptional work. It isn’t possible to discuss every Nadi method, so I’ll give you a brief about those that are by the most popularly known sages.
The Basic Concept:
The absolute basic concept of Indian astrology is that, keeping one thing fixed, changes in all other things can be studied to understand variation in destiny. In all systems of astrology, one basic entity is the fixed reference. Around that, all rules and all variables are manipulated. To give you an understanding, consider the commonly used systems:
Parashari Paddhati: The houses are the fixed entities. Houses give results, houses form yogas, planets are judged as house lords. Afflicted houses bring bad results, strong houses give good results. Placement in good or bad houses gives good or bad results. House lords become yogakaraka or obstruct results. House placements define functional benefic and malefic. Dashas are judged as per lordships and placement in house (not sign). Planets aspect houses.
Jaimini Paddhati: The signs are the reference. Sign based char dasha is used. All planets give results based on placement in signs. Signs have aspects. Signs have qualities and significations. Signs give argala. Signs give results.
Krishnamoorthy Paddhati: The Vimshottari Dasha is the fixed reference. Results are defined by lords, sublords and sub-sublords. House cusps are assessed by lords sublords and subsub. Dashas and results are judged by them. Positivity or negativity depends on them. Even horary numbers denote starlords and sublords.
Lal Kitab: The Kaal Purush Kundali is the reference. 1st house is always Aries, 2nd house is always Taurus and so on. Even if Jupiter is placed in the 2nd house in Capricorn, you need to treat it as being in the 2nd house in Taurus. All results refer to the Kaal Purush chart.
Varshphal/Tajik-Shastra: Solar year is the reference. After each year, the chart of solar return is used for the annual predictions.
Same way, each Nadi too is based on a different reference. With those things in reference, all rules are adapted to fit the reference point. The major Nadi systems and their methodology is as follows:
Navgraha Nadi:
The nine planets are the reference. Their karakatwas are absolute. Results pertain to the karakatwas and the mutual arrangement of planets define result.
For example, if in a sign Venus is at 1 degree, Sun is at 7 degrees, Mercury is at 15 degrees then it can be said that someone in family has had two marriages. If instead, Mercury is in between, and Sun is ahead, it can be said that the wife wear spectacles. Likewise, if Moon and Ketu are conjunct and Jupiter be in the 5th sign from it, all within 5 degrees of each other, it indicates that the mother of the person is born in a city which has a site of pilgrimage. If Sun is in Libra and Venus is in Leo for a girl’s horoscope, it can be said that the father had growth after her birth. If Jupiter is placed with Moon in close conjunction, it can be said that the person was born in a city by the banks of a river/water body. If Jupiter is in Aries and Venus in Pisces, it can said that someone got married a year before the person was born.
Hence, all results depend on mutual placement of planets and their karakatwas. Signs are judged by the karakatwa of their lord. Influences are based not on aspects but on directions. East conjuncts east, East aspects West and so on. Dashas don’t exist. Transits matter.
Bhrigu-Nandi Nadi:
Jupiter replaces the ascendant. It is from Jupiter that the horoscope is judged. However, houses don’t exist. Karakatwas do, and progression of planets are used to depict the future. If Moon has a Saturn Mars conjunction in the the 3rd sign from Moon, the mother would have a surgery in the 15th year of the person’s. If Venus is in the 8th from Jupiter with Mercury in Libra, the person would get married at the 20th year of age to someone younger in age who would be introduced to the person through a relative. If Venus is in 4th from Jupiter in Virgo with Ketu, Saturn and Moon are in the 7th from Jupiter, and Mars aspects Venus, marriage arrangements would get called off for the person after being finalized. The person would then get married at the age of 27 to someone older in age but that again would end in divorce. Finally, the person would get married a widow/widower at the 39th year of age.
Agathiyar Nadi:
This is the famous palm leaf Nadi of south India. Agathiyar Nadi and the Chandra-Kala Nadi primarily use Nadiamsa which is a very magnificent but often abused tool. The Nadiamsa is the 150th division of a sign which spans just about 12 minutes (where 60 minutes = 1 degree, not the measure of time). The 12 minutes span less than 50 seconds and this minute span of time is what is known as a Nadi. The precision is such that no two people can ever be born in the same Nadi. And by the time the same Nadi repeats, planets have moved ahead. However, the Nadiamsa is not a method that you should blindly trust.
The very asset of Nadiamsa becomes its liability. Since it is so precise, you need an atomic clock to keep a time check and to be accurate. More so, any minor error in the calculation of planetary positions based on ephemeris, panchang etc. or any half a minute error is calculation of Sunrise, anything at all can ruin the calcuation to an irrecoverable extent. Even the clocks we use have the precision of a minute, they cannot be accurate to seconds. Even google’s clock is not that accurate due to network delays and transmission lags.
More so, when you tell an astrologer about your birth details, you mention the place of birth. If suppose you are born in Delhi, the distance from South Ex. to Lajpat Nagar is about 4 kms. Because of the difference in coordinates, even if two people are born at the same time in Delhi, the Nadiamsha at Lajpat Nagar will be different from that at South Ex. Now, if you take a better example for Delhi and compare Dwarka which is on the western end, to Noida which is in the Eastern end, the same time would be atleast 10 Nadiamsas apart.
Hence, any astrologer who claims to use Nadiamsa but readily accept birth details you provide, is lying and bluffing to you.
The only identity of your time of birth is you! That exact moment of your birth is embedded in you and all the planetary positions at that particular date, time and place have left their marks on you! Hence, the only way to know your exact Nadiamsa is from you! Which is why, the astrologers match your thumb prints and palm prints. They must correspond to the Nadiamsa. The lines on your palm are nothing but indicators of your planets. Which is why, your Nadiamsa can be known. With that, your horoscope can be interpreted.
Dhruv Nadi:
Dhruv Nadi is the work of Maharishi Satyacharya. The nakshatras are the primary players and their divisions are crucial to assigning results For example, One born in the 4th pada of Pushya Nakshatra (Strongest swa-karaka is taken, need not be only ascendant or only moon) is born in a North-Facing house in front of a street Running east to west. There are lanes on the either side of his house and a temple in the south-east direction to his house. His head is like a temple bell with long hands and broad eyebrows.
Similarly, one born in the first pada of Satbhisha is born in a street running south to north in a west facing house. The landlord of the person is childless and the Native develops great knowledge of Sastras which displays in his behavior and actions (Dr. B V Raman was born as such)
One born in the fourth pada of Ashwini has a pressed nose and hair on toes. If in the first half of fourth pada, a male is born. Females are born in the second half having a mole near their heart on the left side of the body.
Saptarishi Nadi:
This is the great work of the seven sages known as Saptarishi. Most of Parashari astrology comes from this. These have been the direct teachers of Parashara.
The saptarishi Nadi is similar to Parashari astrology but has much profound insights. If Venus is in Gemini and Sun be in Leo, there could be marriage in the dasha of Sun or these could be gain of a Vehicle.
If Saturn Ketu and Mars are there in Taurus and Venus be in the 10th house. Career would face severe obstructions and Venus would not give good results as expected.
These are a few of the Nadis and their prediction methods in a glance. They’re vast texts written in crores of verses however they’re based on the most basic rules of astrology.
Nadi texts are the place from where almost all yogas, and special combinations arise. Several yogas mentioned by Parashara that have been memorized and used over time are obvious logical conclusions for someone learned in the Nadi texts. More so, most Nadis strictly deal with the rashi chart only. No divisional chart is required at all. If you have the 12 boxes of planets with their degrees, you’re good to predict anything without any analysis of dasha, antardasha, D9, D16. Almost every outcome of any calculation is visible to the naked eye if one only looks at the rashi chart.
All of Vastu, Numerology, Muhurat Shastra, etc. origniates out of the Nadi method. In fact, one learned in Nadi can even predict someone’s life by looking at the Vastu of his house.
More so, apart from the Agathiyar Nadi and Nadiamsa method of prediction, no other work on Nadi demands an accurate record of time of birth. Even if the day of someone’s birth is known, predictions can conveniently be made. Rectification is not a necessity but a luxury that you can undertake if at all you’re interested